Monday, November 28, 2022
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आयुष्मान खुराना के साथ एक्सक्लुसिव बातचीत: पहली बार टैबू सब्जेक्ट्स से हटकर फिल्म में नजर आएंगे आयुष्मान


15 मिनट पहलेलेखक: अमित कर्ण

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एक्टर आयुष्मान खुराना अपने करियर की शुरुआत से अलग हट के थीम खासकर टैबू सब्जेक्ट्स पर फिल्में करते आ रहें हैं। अब पहली बार वो कमर्शियल और एक्शन फिल्म आ रहे हैं। इसमें उनका किरदार भी एक एक्शन करने वाले फिल्म स्टार मानव का है। अपनी फिल्म से जुड़े कुछ खास पहलुओं पर आयुष्मान ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की है। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:-

इस फिल्म को करने के लिए कैसे तैयार हुए

मैं स्क्रिप्ट के मामले में बहुत चूजी हूं, लेकिन इस फिल्म की स्क्रीप्ट ऐसी निकली कि मुझे ये करने के लिए अपने आप को ज्यादा मनाना नहीं पड़ा। जब मैं ‘अनेक’ शूट कर रहा था तो इसकी नैरेशन मैंने जूम कॉल पर ली थी। मुझे हमेशा लगता था कि जूम कॉल पर नैरेशन शायद ही मजेदार हो, मगर इसकी नैरेशन इतनी कमाल की निकली कि मैं बता नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे ऐसी स्क्रिप्ट चाहिए, जहां मैं अलग दिखूं। फिल्म अलग दिखनी चाहिए जो दर्शकों को बांध कर रख सके।

क्या कुछ जेहन में था कि पोस्ट पैंडेमिक ऑडिएंस को अब क्या चाहिए

फिल्म जरा वाइडर होनी चाहिए। ऑडिएंस को लिमिट नहीं करना चाहिए। एलजीबीटी कम्युनिटी पर बेस्ड फिल्में ऑडिएंस को लिमिट करती है। या अगर आप की फिल्म डॉक्युमेंट्री स्टाइल की हो, ऑडिएंस वहां लिमिट होते है। या जैसे ‘डॉक्टर जी’ जैसी फिल्म थी, वह ऑलरेडी ए रेटेड फिल्म थी, जो ऑडिएंस को लिमिट करती थी। प्री पैंडेमिक ऐसा नहीं था। उस दौर में वैसी फिल्में चलती थीं। आज कम्युनिटी व्युइंग आप करते हैं तो पूरा परिवार फिल्म देखना चाहता है। मेरे जेहन में था कि अब जो कुछ सेलेक्ट करूं, वो टैबू से बढ़कर एक बड़ी ऑडिएंस को रिलेट करनी वाली फिल्म हो।

उदाहरण के साथ कुछ समझा सकते हैं

मसलन, ‘ड्रीम गर्ल’ और ‘एन एक्शन हीरो’ जैसी फिल्में हैं। दोनों में वैसी सब्जेक्ट नहीं थी जैसी ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में थी। वहां हम एलजीबी कम्युनिटी की बात कर रहे थे। मुझे ऐसे कई लोग मिले, जिन्होंने कहा कि उन्हें ट्रेलर तो बहुत अच्छा लगा, मगर देखने थिएटर्स में नहीं गए। बच्चों पर असर पड़ेगा तो क्या? हालांकि मेरा तो मानना है कि बच्चों को तो शुरू से ऐसे सब्जेक्ट्स पर फिल्में दिखानी चाहिए। ताकि उस बिरादारी को लेकर सोच और विकसित और बेहतर हो। बेशक रातों रात तो हम सिर्फ फिल्मों से समाज की धारणा नहीं बदल सकते, मगर थिएट्रिकल में सफलता हासिल करनी हो तो जरा सा वाइड जाना होगा।

इस फिल्म में आपने कुछ बदलाव करवाया

नहीं। यह फिल्म प्रॉपर कमर्शियल फिल्म है। इसके डायलॉग, फाइट सीक्वेंसेज, स्केल सबके स्तर बड़े पैमाने के हैं।ये एक हार्डकोर एक्शन फिल्म है। कुछ खास चेंजेज नहीं हुए इसमें। सिवाय एकाध गाने के, जो मेरे और प्रोड्युसर भूषण जी के चलते आए। बाकी यह कोई सोशल मैसेज वाली फिल्म नहीं है। यह पॉपकॉर्न एंटरटेनमेंट वाली फिल्म है। यह बॉलीवुड के लिए नए जॉनर की फिल्म है।

शायद पहली बार आपके ऐट पैक एब्स देखने को मिलेंगे

मानव के किरदार के लिए बॉडी की बहुत जरूरत थी। यहां मसलन गेन करने से ज्यादा जोर लीन रहने पर था। तो यहां वो मसल्स नहीं थे, जो ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ में थे। वहां तो वेट भी 75 किलो हो गया था। इस फिल्म में 71 किलो वजन रहा।

शूट के दौरान कुछ और इंटरेस्टिंग हुआ हो

मैंने इसी सेम फिल्म में दो तरह के एक्शन किए हैं। मुंबई में हमारे साथ साउथ इंडियन स्टंट डायरेक्टर भी थे। उनका नाम स्टंट सिल्वा था। उन्होंने मेरे किरदार मानव के वो स्टंट डिजाइन करवाए, जो मानव अपनी फिल्मों की शूट पर करता था। यानी एंटी ग्रैविटी वाले लार्जर दैन लाइफ वाले एक्शन जैसे साउथ इंडियन फिल्मों में होते हैं। फिर जब मानव की भिड़ंत उसकी जान के पीछे पड़े भूरा सोलंकी के साथ होती थी तो उसे इयान, फिलिक्स ने डिजाइन किए। वो हैंड टू हैंड कॉम्बैट वाले एक्शन थे।

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